माघ सुदी बीज को चाहमान वंश की कुलदेवी श्री राजराजेश्वरी आशापुरा माताजी का प्राकट्योत्सव दिवस एवं नडडूलराय परम भट्टारक परमेश्वर महाराजाधिराज महाराव श्री लाखणसी चहुंआँण की जयन्ति की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
आद मात अंबा, छत्र चौहान धराई।
तुठी राणंग राय, सेभरी नाथ सवाई।
जागे लाखा जाग, अंबे आशापुर आई।।
प्रथीनाथ प्रतित कर, धणी होय भोगव धरा।
चौवीस शाख चौहान, अंबे देव आशापुरा।।
शाकंभरी-अजमेर के महापराक्रमी चक्रवर्ती चाहमान राजवंश में महान विजेता महाराज वाक्पतिराज (प्रथम) हुऐ, जो 188 युद्धों के विजेता थे। सांभर नरेश वाक्पतिराज के तीन पुत्र सिंहराज, वत्सराज और लक्ष्मण हुए। सबसे छोटे पुत्र लक्ष्मण जिन्हें राव लाखणसी अथवा लाखण नाम से जाना जाता है। वाक्पतिराज के स्वर्गवास के पश्चात शाकंभर की गद्दी पर 944 ई में उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज सिंहराज पिता के उत्तराधिकारी हुए। लक्ष्मण एक महत्वाकांक्षी पुरूष थे। वह अपने पराक्रम एवं पुरुषार्थ के द्वारा नया राज्य प्राप्त करना चाहते थे इसलिए वह सांभर से निकल कर अपनी पत्नी उर्मिला व सेवक के साथ दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ते हुए पुष्कर तीर्थ पहुंचे। यहां पर स्नान करके अरावली पर्वतों की ऊंची नीची पहाड़ियों को पार करते हुए सप्तशत(गोडवाड़ क्षेत्र का प्राचीन नाम जिसका अर्थ होता है घोड़ों की खान) की ओर प्रस्थान किया व नाडोल के समीप नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में रुके। गोड़वाड़ प्रांत में उन दिनों पल्लिका (पाली) और नडडूल(नाडोल) प्रधान व्यापारिक केंद्र थे। इस कारण से नाडोल की प्रजा को मेद जाति के लूटेरो ने परेशान कर रखा था। पर इस समय नाडोल पर सामंतसिंह चावड़ा का शासन था जो गुजरात का सामंत था। यह एक अयोग्य व विलासी शासक था जिसके प्रति प्रजा का असंतोष उफान पर था।
नाडोल में भी लाखणसी ने चाहमान वंश की कुलदेवी माँ शाकम्भरी के रूप की ही आराधना की थी। कुलदेवी की वरदान कथानुसार रात्रि में लाखणजी को माँ ने दर्शन देकर विजय और महान राज्य स्थापित होने का आशीर्वाद दिया। जिस दिन माँ ने यह आशीर्वाद दिया उस दिन वि.सं. 1000 माघ सुदी 2 की तिथि थी। आशापुरी देवी की कृपा होने से देवी ने तेरह हजार अश्व दिये।
हे माता आशापुरा, जगजननी जगदम्ब।
भक्तजनों के कार्य में, माँ करती नहीं विलम्ब।।
कवि आसीआ माला के कवित्त में लिखा है कि, "तेर सहम तुरंग सफत वरदान समेपे" अर्थात् शक्ति के वरदान से मालव क्षेत्र के 13,000 घोड़े अपने-आप नाडोल पहुँच गये। उन घोड़ो को प्राप्त कर एक अजेय सेना तैयार करके लाखणसी ने 960 ई में नाडोल के अयोग्य शासक सामंतसिंह चावड़ा को हराकर अपने पौरुष बल से नाडोल पर अधिकार कर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर कुछ वर्षों में एक शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया। माँ के आशीर्वाद स्वरूप उनकी सभी आशाएं पूर्ण होने व अलग राज्य की स्थापना करने पर लक्ष्मण ने माता को आशापुरा(आशा पूरी करने वाली) नाम से संबोधित किया। जिसकी वजह से माता शाकम्भरी एक और नाम “आशापुरा” के नाम से विख्यात हुई और कालांतर में चौहान वंश व आमजन माता शाकम्भरी को माँ आशापुरा के नाम से पूजने लगे व कुलदेवी मानने लगे। इस प्रकार लक्ष्मण माँ शाकम्भरी से आशीर्वाद पाकर अपने भाई सांभर के शासक सिंहराज के समान ही नाडोल के शासक बने और अपने पूर्वजों की भांति चाहमान साम्राज्य की शक्ति का विस्तार किया। राव लाखण ने मेदों (मेवों) का दमन नाडोल, गोड़वाड़ तथा मारवाड़ क्षेत्र को आतंकित करने वाले मेदों का संहार कर क्षेत्र में शांति स्थापित की व प्रजा को सुख-शान्ति प्रदान की। मेदों के साथ भीषण युद्ध के दौरान घायल अवस्था में जहां लक्ष्मण ने पानी पिया था, उसके समीप ही उन्होंने माघ सुदी दूज 981 ई को राजराजेश्वरी कुलदेवी माँ आशापुरा जी के पाट स्थान की स्थापना नाडोल में भारमली नदी के पास की और मंदिर के पास ही उस कच्चे जलाशय को पत्थरों से अलंकृत कर पक्की बावड़ी बनवा दी। यह बावड़ी आज भी अपने महान् निर्माता की याद को जीवन्त बनाये हुए हैं। नाडोल में सुदृढ़ दुर्ग तथा भव्य राजमहल बनवाया। नाडोल नगर सुदृढ़ प्राचीर से घिरा हुआ था, उसमें 9 प्रवेश द्वार(पोल) और 7 पक्की बावड़ियां बनी हुई थी। नाडोल में प्रसिद्ध सूरजपोल का निर्माण भी राव लाखण ने कराया। नाडोल नगर की महत्ता तब प्रकाश में आई जब लक्ष्मण ने इसे चाहमान राजसत्ता का प्रमुख प्रतिष्ठान बना दिया। चौहान सत्ता की प्रतिष्ठा के साथ ही नाडोल विकास की रह पर अग्रसर होता गया। एक प्राचीन पद के अनुसार राव लाखण अपने समयकाल में इतने शक्तिशाली थे कि पाटण की उरली पोल से (पाटण की सीमा पर से) चौहान ने दाण उगाया और वैसे (मेवाड मंड लख दंडे) मेवाड़ में आक्रमण करके लाखण ने दंड लिया। फाल्गुन सुदी 5, संवत् 1025/ सन् 968 ई. को प्रतिष्ठित नीलकंठ महादेव मन्दिर का शिलालेख, जो स्वयं राव लक्ष्मण ने उत्कीर्ण करवाया था। इसी शिलालेख से पता चलता है कि राव लक्ष्मण ने लक्ष्मण-स्वामी विष्णु मंदिर बनवाया। इनके समय के दो अन्य शिलालेख 1014 व 1036 वि.सं. के नाडोल में मिले थे। लाखणजी के वंशजों से ही चौहान वंश की अधिकतर शाखाओ का निकास नाडोल से ही हुआ।
माँ आशापुराजी का यह महान् भक्त राव लक्ष्मण या लाखण चाहमान राजवंश के महान् शासकों में से एक थे। उनकी वीरता, निर्भयता और पराक्रम की चर्चा करते हुए जालोर के शासक चाचिंगदेव सोनगरा का 1262 ई का सुन्धा माता शिलालेख इन्हें 'शाकम्भरीन्द्र' तथा माउन्ट आबू का शिलालेख 'शाकम्भरी माणिक्य' अर्थात् साँभर का हीरा से विभूषित करता है। सिंहराज चाहमान राजवंश के प्रथम शासक थे जिन्होंने महाराजाधिराज की पदवी धारण की और लक्ष्मण एकमात्र राजा थे जिन्हें शाकम्भरी माणिक्य से विभूषित किया गया। लोग अक्सर यह कहते है कि,"मैं अकेला हूँ, क्या कर सकता हूं?" उन्हें इस इतिहास से सबक लेना चाहिए की जिस प्रकार अकेला व्यक्ति लक्ष्मण माँ शाकंभरी की कृपा से नाडोल जैसे विस्तृत साम्राज्य का स्वामी बना था वैसे ही आप भी निश्चल होकर माँ आशापुरा की आराधना कर अपने कर्म कीजिए और विश्वास कीजिए की माँ आपकी सभी इच्छाएं जरूर पूर्ण करेगी।
राजराजेश्वरी कुलदेवी नाडोल राय माँ आशापुराजी मंदिर, नाडोल में मुख्य मंदिर के ठीक सामने राव लाखण जी की एक देवली लगी हुई है तथा देवली पर 5 पंक्तियों का एक लेख उत्कीर्ण है। इस लेख का पठन मेरे द्वारा सेव आवर हेरिटेज फाउंडेशन टीम के संग्रामसिंहजी गिंगालिया से दिनांक:15-10-2022 को करवाया गया, जो लेख पठन इस प्रकार से है :-
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।। संवत १ ७ ४ १ वुरष म-
ह असज सद ७ वत्स संघज -
न्ह मर्ती लाषण् क वन-
इज क द् व(द्वळी) सद १ मि-
त चत थव(प)ना ह्व वतसी
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लेख का हिंदी अनुवाद :-
।।सम्वत १७४१ वर्ष माह-
आसोज सुदी ७ वत्स सिंघजी
ने मूर्ति लाषन की बनवाई
की देवळी सुदी १ मिती
चेत थरपना(प्रतिष्ठा) हुई वतसीं
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इस देवली के लेख के पठन से हमें यह जानकारी मिलती है की यह देवली वि.सं. 1741 या 1684 ई में आषाढ़ माह सुदी 7 (सप्तमी) को वत्ससिंहजी के द्वारा राव लाखणजी की मूर्ति बनवाई गई थी। इस देवली की प्रतिष्ठा चैत्र नवरात्रा की 1 (प्रथमा) तिथि को करवाई गई थी। यहां यह शोध का विषय है की इस देवली को बनवाने वाले वत्ससिंहजी कौन थे?
चौहानो के नाडोल राजवंश की राजावली :
1.राव लाखण (960-982 ई.)
2.राव शोभित (982-990 ई.)
3.राव बलिराज (990-994 ई.)
4.राव विग्रहपाल (994 ई.)
5.राव महेन्द्रराज (994-1005 ई.)
6.राव अश्वपाल (1005-1015 ई.)
7.राव अहिल (1015-1024 ई.)
8.राव अणहिलराज (1024-1055 ई.)- भीमदेव प्रथम, भोज परमार व महमूद गजनवी को पराजित किया।
9.राव बालाप्रसाद (1055-1070 ई.)
10.राव जेन्द्रराज (1070-1080 ई.)
11.राव पृथ्वीपाल (1080-1090 ई.)
12.राव जोजलदेव (1090-1110 ई.)
13.राव आसराज (1110-1119 ई.)
14.राव रत्नपाल (1119-1132 ई.)
15.राव रायपाल (1132-1145 ई.)
16.राव सहजपाल (1145-1148 ई.)
17.राव आल्हण (1148-1163 ई.)-इन्ही के पुत्र कीर्तिपाल से जालोर की सोनगरा व विजयसिंहजी से चाहमान वंश की सांचोरा शाखा चली।
18.राव केल्हणदेव (1163-1193 ई.)-1178 ई में मो. गौरी को हराया।
19.राव जयंतसिंह (1193-1197 ई.)
20.राव सामंतसिंह (1197-1202 ई.)-इनके बाद नाडोल का राज्य जालौर के सोनगरा चौहानों के अधीन हो गया।
सेवग गहरो सांभरी, प्रण राखण प्रतिपाल।
कीरत चहुँदिस आपरी, पसरे प्रिय दयाल।।
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी
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