सोमवार, 9 मार्च 2026

पाली अधिपति राव अखेराज सोनगरा

पाली अधिपति राव अखेराज सोनगरा- सुमेल गिरी युद्ध के योद्धा

क्षत्रियों के छत्तीस कुलों में चाहमान सदैव सर्वश्रेष्ठ रहें हैं। इस श्रेष्ठता की कीमत चक्रवर्ती चाहमानों ने अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ अपने शीश देकर चुकाई हैं। मातृभूमि, देश, सनातन धर्म और कुल की मर्यादा के लिए जहाँ चाहमान वीरों ने साका कर युद्धभूमि में अंतिम रक्त की बूंद तक मरण को श्रेष्ठ माना वही वीरांगनाओं ने जौहर की ज्वाला को आत्मसात किया। यही जौहर की ज्वाला समय आने पर माताओं के सम्मान की संरक्षिका बनी और शत्रु की संहारक भी। जालोर के प्रसिद्ध शासक कान्हड़देव सोनगरा के छोटे भाई मालदेव मुंछाला थे। मालदेव के वंशक्रम में पाली के शासक रणधीर के पुत्र अखेराज सोनगरा हुये। जो अपने समय के कुशल नितिज्ञ, पराक्रमी, दातार और प्रसिद्ध योद्धा थे। मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर राजघरानों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध उस काल में उनके विशिष्ट स्थान व उनकी महत्ता की पुष्टि करते हैं। अखेराज सोनगरा ने मारवाड़ व मेवाड़ की सहायतार्थ कई सैनिक अभियानों में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था। 

राणा उदयसिंह को मेवाड़ गद्दी पर आसीन करना : बनवीर (राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज का बेटा) ने 1536 ई में विक्रमादित्य (राणा सांगा के बेटे) की हत्या कर दी और चित्तौड़ की सत्ता हथियाली थी। बनवीर, विक्रमादित्य के छोटे भाई उदयसिंह द्वितीय (सांगा का पुत्र) को मारकर अपनी सत्ता सुरक्षित करना चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि उदयसिंह ही असली उत्तराधिकारी है। उसने उदयसिंह को मारने की कोशिश की, लेकिन पन्नाधाय ने उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उसके षड़यंत्र को विफल कर दिया और उदयसिंह को कुंभलगढ़ पहुँचाया था। मेवाड़ की सत्ता हथियाने के बाद बनवीर ने उदयसिंह के नकली होने के का प्रचार कर दिया था। अखेराज सोनगरा ही वह पहले राजपूत शासक थे, जिन्होंने मेवाड़ के उदयसिंह के सिर शासक का ताज रखने की राह निकाली। मेवाड़ के उमरावों द्वारा उदयसिंह के साथ एक थाली में खाना खाकर शंका का समाधान करने के बाद उनके अनुरोध पर अखेराज सोनगरा ने अपनी पुत्री जयवंता बाई सोनगरी का विवाह राणा उदयसिंह के साथ करने की घोषणा की और उन्हें घोड़े, हाथी और रुपए भी दहेज स्वरूप दिये। यह विवाह होते ही उदयसिंह को मेवाड़ के उमरावों व चौहानों के साथ मारवाड़ का समर्थन भी स्वत: हासिल हो गया क्योंकि अखेराज सोनगरा राव मालदेव के समय में पाली के स्वतंत्र शासक थे व उनके ससुर थे। अखेराज जी की एक पुत्री पुरां सोनगरी का विवाह राव मालदेव के साथ हुआ था। राणा उदयसिंह ने बनवीर से लड़ाई के लिए अखेराज जी से सहायता मांगी। अत: मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर कुम्पा, राणा, भदा, कान्ह, जैतसी उदावत व खींवकरण जी जैतारण आदि मारवाड़ व पाली की सेना लेकर अखेराज सोनगरा के साथ बनवीर से लोहा लेने मेवाड़ पहुंचे। जहां मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत वहां के उमरावों को साथ लेकर माहौली (मावली) के निकट 1540 ई में घमासान युद्ध हुआ जिसमें बनवीर हार कर भाग गया। अनन्तर मेवाड़, मारवाड़ व पाली की संयुक्त सेनाओ ने चितौड़ पर अधिकार कर राणा उदयसिंह को राजगद्दी पर बैठा दिया। इस तरह मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए अखेराज सोनगरा के साथ रिश्तेदारी मेवाड़ के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुई क्योंकि अखेराज सोनगरा उदयसिंह के साथ अपनी बेटी का विवाह नहीं करते तो शायद उनकी ताजपोशी भी मुश्किल थी, क्योंकि किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि पन्नाधाय ने जिस बालक को बचाया है, वह उदयसिंह ही है। इस तरह अखेराज सोनगरा की मदद से चित्तौड़ में सिसोदियो का सूर्य फिर उदय हुआ। जयवंता बाई की कोख से ज्येष्ठ सुदी तीज, 09 मई 1540 को रात्री 9 बजे आद्रा नक्षत्र में राणा प्रताप का जन्म पाली किले में हुआ। कुंवर प्रताप के जन्म पर उनके नानोसा अखेराजजी ने बहुत खुशियां मनाई।  

सुमेल गिरी युद्ध : राठौड़ वंश में जोधपुर के शासक मालदेव, मेड़ता के वीरमदेव व बीकानेर के कल्याणमल के बीच आपसी कलह के चलते मेड़ता के वीरमदेव के बुलावे पर 1544 ई में दिल्ली के बादशाह शेरशाह सूरी को राव मालदेव पर आक्रमण का मौका मिल गया। इतिहास बताता है कि राव अखेराज सोनगरा का मेवाड़, मारवाड़ सहित कई रियासतों में दबदबा था। इनकी वीरता के कारण ही शेरशाह सूरी की चढ़ाई की खबर कुम्पाजी ने अखेराज सोनगरा के पास पाली भेजी। इतिहासकार डॉ. हुकमसिंह भाटी के अनुसार अखेराज उस वक्त अपने साथियों संग लाखोटिया सरोवर में स्नान कर रहे थे। सन्देश वाहक रैबारी ने सूचना दी तो अखेराज प्रसन्न हुए क्योंकि उनका मानना था कि क्षत्रिय के लिए युद्ध लड़ना या युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राणोत्सर्ग करना श्रेष्ठ बात है। सूचना के बाद अखेराज अपने पुत्र भोजराज के साथ अपना सैन्यदल लेकर शेरशाह से मुकाबले के लिए अजमेर में राव कूंपा के पास जा पहुंचे। राव मालदेव भी सेना के साथ अजमेर पहुंच गए। मालदेव के कहने पर मारवाड़ की सेना ने अजमेर से हटकर गिरी के पास पड़ाव डाला। इस बीच किसी धोखे व षड्यंत्र की आशंका के चलते मालदेव युद्ध क्षेत्र से अनेक सरदारों व अधिकांश सेना के साथ रात को ही जोधाणा होते हुए सिवाना का रुख कर लिया। इस खबर से मारवाड़ की तरफ से लड़ रहे पीछे रहे योद्धाओं को बहुत दुख हुआ। तब राव अखेराज सोनगरा पाली, राव खींवकरणजी जैतारण, राव कुम्पाजी माण्डा, राव जैताजी बगड़ी, राव पंचायणजी खींवसर, जैतसी उदावत आदि निर्भीक योद्धाओं ने बिना मारवाड़ के राजा के शेरशाह से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया और अपने से कई गुना बड़ी सेना के साथ भीड़ गए। सुबह होते ही सुमेल के युद्धक्षेत्र में इस लड़ाई में जांबाज राव अखेराज सोनगरा पाली सहित लगभग 6 हजार (कुछ किताबों में 12 या 22 हजार) सैनिकों ने शेरशाह की 40 तोपों सहित 80 हजार सैनिकों की भारी भरकम सेना पर शेर की तरह दहाड़ते हुए हुंकार कर टूट पड़े व डटकर मुकाबला किया। इससे शेरशाह के सैनिकों में अफरा-तफरी मच गई। छोटी सेना के बड़े पराक्रम को भांप कर शेरशाह के सैनिकों ने उनको गिरी-सुमेल रणक्षेत्र छोड़ने की सलाह दे दी। इस रण में मारवाड़ व पाली के पराक्रमी जांबाज बलिदान हो गए, लेकिन इनके युद्ध कौशल का साक्षी रहा गिरी-सुमेल रणक्षेत्र इतिहास का अध्याय बन गया। इस युद्ध में अखेराज ने अपनी तलवार का जौहर दिखाते हुए अपने पुत्र भोजराज व 21 अन्य सोनगरा चौहानों के साथ वीरगति प्राप्त की। यह युद्ध चैत्र बदी पंचमी वि.सं. 1600 या 1544 ई को हुआ था। इस युद्ध में मारवाड़ के वीरों के छोटे से सैन्य दस्ते ने शेरशाह की विशाल सेना का भयानक नुकसान किया। इसके बाद बौखलाए शेरशाह सूरी द्वारा कहा गया एक वक्तव्य इतिहास में प्रचलित है :
बोल्यो सूरी बैण यूँ, गिरी घाट घमसाण।
मूठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण।।
अर्थात् मैं “एक मुट्ठी बाजरे के लिए वह हिंदुस्तान की सल्तनत खो देता।"
वीरता के साथ-साथ अखेराज जी शकुन विद्या के भी अच्छे जानकार थे। उन्होंने अपने सैनिक अभियानों व प्रशासनिक कार्यों के अनुभव पर “सुगनावली” नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें शकुन देखने की विधि, दिशाओं का ज्ञान, रोजगार के जाने, राजा से मिलने, युद्ध अभियान के लिए प्रस्थान करने, कामदार आदि कर्मचारियों की नियुक्ति करने या हटाने, राजा का राजधानी से प्रस्थान करने, बारात प्रस्थान, अकाल-सुकाल, वस्तुओं के मूल्य घटने-बढ़ने, जलाशय तथा कुआ खुदवाने इत्यादि अनेक विषयों पर अच्छे-बुरे शकुनों की जानकारी सरल भाषा में लिपिबद्ध की।

राव अखेराज के वंशज : अखेराजजी के मानसिंह, भाणसिंह, उदयसिंह, भोजराज, जयमल व रतनसिंह पुत्र थे। मानसिंह पाटवी हुए जो 1576 ई के हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनके पुत्र जसवंतसिंह राणा प्रताप के छापामार युद्धों में शामिल रहे। मारवाड़ के मोटाराजा उदयसिंह ने उनको विसं 1644 में बुलाया व पाली पट्टे की जागीर 27 गांवों के साथ दी, फिर 30 गांव दिए। विसं 1665 के आसपास पाली छूट गया तब वे उदयपुर राणा के पास गए, जसवंतसिंह के 11 पुत्र थे। इनमे सबसे बड़े पुत्र वीरमदेव थे। जसवंतसिंह के पुत्र राजसिंह को भी विसं 1672 में पाली का ठिकाना रहा बाद में छूट गया। इनके एक पुत्र जगन्नाथ को विसं 1677 में पाली का पट्टा मिला पर 1691 में अमरसिंह राठौड़ के साथ जाने से पाली फिर छूट गयी। इनके पुत्र श्यामसिंह को 1679 में जोधपुर रियासत के गुड़ा-भाद्रजूण जागीर में मिला। श्यामसिंह के पुत्र उदयभान, महाराजा जसवंतसिंह के साथ कई लड़ाइयों में लड़े। इनके अन्य भाईयों को मालवा में कई जमींदारिया मिली। उदयभान के पुत्र भोपतसिंह को रतलाम रियासत की में 5 गाँवो सहित नामली का ठिकाना विसं 1788 में मिला। इनके वंशजों की रतलाम राज्य में बाजड़ा, सकरवाद, सिरखेड़ी, भदवासा; जावरा राज्य में बदगढ़; सैलाना राज्य में गुणावद; ग्वालियर राज्य में बानीखेड़ी आदी की जमींदारिया थी। रतलाम पर बापूराय सिंधिया द्वारा आक्रमण करने पर तेजसिंह रणखेत रहे। तेजसिंह के वंशजों के लावा मालवा में अन्य अखेराज सोनगरों की अरजला, अरसंदला, उमरने, नलकोई, पीपलखूंटा, झरखेड़ी, काडरवास आदि गाँवो की जमींदारिया थी जहाँ इनके वंशज आज भी निवास करते है। श्री अखेराज सोनगरा स्मारक विकास समिति द्वारा अखेराज जी के वंशजों के ठिकानों गिरवर, कूरना, बाला, डेंडा, कांतरा, दयालपुरा, गुड़ा सोनीगरा, चावंडिया, केनपुरा, बोया, सादड़ा, ऐलानी, धणी, पीपाड़ा, निंबाज, हिदास, नामली आदि के सहयोग से निर्मित स्मारक रणभूमि को समर्पित किया गया।
प्रमुख छ:हों सामंतों का प्राचीन छप्पय -
खागडेल भिड़ खींम, खलां दल त्रिजड़ो खंडै। 
सबल जैतसी सूर, थटां पतसाही थंडै।। 
जेता कूंपा जोध, गयन्द तुखारों गंजै। 
अखेराज चहुॅंआण, भिड़ों दल दिल्ली भंजै।। 
पंचायण सूरो प्रबल, किलमांणां कलहल करै। 
माल जसो मुड़ियां पछे, सांवत छै साथे मरै।।
सुमेल गिरी युद्ध के महानायक पाली के शासक राव अखेराजजी सोनगरा चौहान, कुंपाजी, जैताजी, खींवकरणजी सहित हजारो क्षत्रिय वीरों के बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन। ऐसे वीर अमर रणबांकुरो के त्याग और बलिदान के कारण ही हमारा धर्म संस्कृति बची है। 

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
 आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी

मंगलवार, 20 जनवरी 2026

लक्ष्मण(लाखणसी) चहुंआँण

नडडूलराय परमभट्टारक परमेश्वर महाराजाधिराज महाराव श्री लक्ष्मण(लाखणसी) चहुंआँण

माघ सुदी बीज  को चाहमान वंश की कुलदेवी श्री राजराजेश्वरी आशापुरा माताजी का प्राकट्योत्सव दिवस एवं नडडूलराय परम भट्टारक परमेश्वर महाराजाधिराज महाराव श्री लाखणसी चहुंआँण की जयन्ति की बहुत बहुत शुभकामनाएं।
आद मात अंबा, छत्र चौहान धराई।
तुठी राणंग राय, सेभरी नाथ सवाई।
जागे लाखा जाग, अंबे आशापुर आई।।
प्रथीनाथ प्रतित कर, धणी होय भोगव धरा।
चौवीस शाख चौहान, अंबे देव आशापुरा।।
शाकंभरी-अजमेर के महापराक्रमी चक्रवर्ती चाहमान राजवंश में महान विजेता महाराज वाक्पतिराज (प्रथम) हुऐ, जो 188 युद्धों के विजेता थे। सांभर नरेश वाक्पतिराज के तीन पुत्र सिंहराज, वत्सराज और लक्ष्मण हुए। सबसे छोटे पुत्र लक्ष्मण जिन्हें राव लाखणसी अथवा लाखण नाम से जाना जाता है। वाक्पतिराज के स्वर्गवास के पश्चात शाकंभर की गद्दी पर 944 ई में उनके बड़े पुत्र महाराजाधिराज सिंहराज पिता के उत्तराधिकारी हुए। लक्ष्मण एक महत्वाकांक्षी पुरूष थे। वह अपने पराक्रम एवं पुरुषार्थ के द्वारा नया राज्य प्राप्त करना चाहते थे इसलिए वह सांभर से निकल कर अपनी पत्नी उर्मिला व सेवक के साथ दक्षिण दिशा की तरफ बढ़ते हुए पुष्कर तीर्थ पहुंचे। यहां पर स्नान करके अरावली पर्वतों की ऊंची नीची पहाड़ियों को पार करते हुए सप्तशत(गोडवाड़ क्षेत्र का प्राचीन नाम जिसका अर्थ होता है घोड़ों की खान) की ओर प्रस्थान किया व नाडोल के समीप नीलकंठ महादेव मंदिर परिसर में रुके। गोड़वाड़ प्रांत में उन दिनों पल्लिका (पाली) और नडडूल(नाडोल) प्रधान व्यापारिक केंद्र थे। इस कारण से नाडोल की प्रजा को मेद जाति के लूटेरो ने परेशान कर रखा था। पर इस समय नाडोल पर सामंतसिंह चावड़ा का शासन था जो गुजरात का सामंत था। यह एक अयोग्य व विलासी शासक था जिसके प्रति प्रजा का असंतोष उफान पर था। 
नाडोल में भी लाखणसी ने चाहमान वंश की कुलदेवी माँ शाकम्भरी के रूप की ही आराधना की थी। कुलदेवी की वरदान कथानुसार रात्रि में लाखणजी को माँ ने दर्शन देकर विजय और महान राज्य स्थापित होने का आशीर्वाद दिया। जिस दिन माँ ने यह आशीर्वाद दिया उस दिन वि.सं. 1000 माघ सुदी 2 की तिथि थी। आशापुरी देवी की कृपा होने से देवी ने तेरह हजार अश्व दिये। 
हे माता आशापुरा, जगजननी जगदम्ब।
भक्तजनों के कार्य में, माँ करती नहीं विलम्ब।।
कवि आसीआ माला के कवित्त में लिखा है कि, "तेर सहम तुरंग सफत वरदान समेपे" अर्थात् शक्ति के वरदान से मालव क्षेत्र के 13,000 घोड़े अपने-आप नाडोल पहुँच गये। उन घोड़ो को प्राप्त कर एक अजेय सेना तैयार करके लाखणसी ने 960 ई में नाडोल के अयोग्य शासक सामंतसिंह चावड़ा को हराकर अपने पौरुष बल से नाडोल पर अधिकार कर स्वतंत्र राज्य स्थापित कर कुछ वर्षों में एक शक्तिशाली साम्राज्य बना दिया। माँ के आशीर्वाद स्वरूप उनकी सभी आशाएं पूर्ण होने व अलग राज्य की स्थापना करने पर लक्ष्मण ने माता को आशापुरा(आशा पूरी करने वाली) नाम से संबोधित किया। जिसकी वजह से माता शाकम्भरी एक और नाम “आशापुरा” के नाम से विख्यात हुई और कालांतर में चौहान वंश व आमजन माता शाकम्भरी को माँ आशापुरा के नाम से पूजने लगे व कुलदेवी मानने लगे। इस प्रकार लक्ष्मण माँ शाकम्भरी से आशीर्वाद पाकर अपने भाई सांभर के शासक सिंहराज के समान ही नाडोल के शासक बने और अपने पूर्वजों की भांति चाहमान साम्राज्य की शक्ति का विस्तार किया। राव लाखण ने मेदों (मेवों) का दमन नाडोल, गोड़वाड़ तथा मारवाड़ क्षेत्र को आतंकित करने वाले मेदों का संहार कर क्षेत्र में शांति स्थापित की व प्रजा को सुख-शान्ति प्रदान की। मेदों के साथ भीषण युद्ध के दौरान घायल अवस्था में जहां लक्ष्मण ने पानी पिया था, उसके समीप ही उन्होंने माघ सुदी दूज 981 ई को राजराजेश्वरी कुलदेवी माँ आशापुरा जी के पाट स्थान की स्थापना नाडोल में भारमली नदी के पास की और मंदिर के पास ही उस कच्चे जलाशय को पत्थरों से अलंकृत कर पक्की बावड़ी बनवा दी। यह बावड़ी आज भी अपने महान् निर्माता की याद को जीवन्त बनाये हुए हैं। नाडोल में सुदृढ़ दुर्ग तथा भव्य राजमहल बनवाया। नाडोल नगर सुदृढ़ प्राचीर से घिरा हुआ था, उसमें 9 प्रवेश द्वार(पोल) और 7 पक्की बावड़ियां बनी हुई थी। नाडोल में प्रसिद्ध सूरजपोल का निर्माण भी राव लाखण ने कराया। नाडोल नगर की महत्ता तब प्रकाश में आई जब लक्ष्मण ने इसे चाहमान राजसत्ता का प्रमुख प्रतिष्ठान बना दिया। चौहान सत्ता की प्रतिष्ठा के साथ ही नाडोल विकास की रह पर अग्रसर होता गया। एक प्राचीन पद के अनुसार राव लाखण अपने समयकाल में इतने शक्तिशाली थे कि पाटण की उरली पोल से (पाटण की सीमा पर से) चौहान ने दाण उगाया और वैसे (मेवाड मंड लख दंडे) मेवाड़ में आक्रमण करके लाखण ने दंड लिया। फाल्गुन सुदी 5, संवत् 1025/ सन् 968 ई. को प्रतिष्ठित नीलकंठ महादेव मन्दिर का शिलालेख, जो स्वयं राव लक्ष्मण ने उत्कीर्ण करवाया था। इसी शिलालेख से पता चलता है कि राव लक्ष्मण ने लक्ष्मण-स्वामी विष्णु मंदिर बनवाया। इनके समय के दो अन्य शिलालेख 1014 व 1036 वि.सं. के नाडोल में मिले थे। लाखणजी के वंशजों से ही चौहान वंश की अधिकतर शाखाओ का निकास नाडोल से ही हुआ।
माँ आशापुराजी का यह महान् भक्त राव लक्ष्मण या लाखण चाहमान राजवंश के महान् शासकों में से एक थे। उनकी वीरता, निर्भयता और पराक्रम की चर्चा करते हुए जालोर के शासक चाचिंगदेव सोनगरा का 1262 ई का सुन्धा माता शिलालेख इन्हें 'शाकम्भरीन्द्र' तथा माउन्ट आबू का शिलालेख 'शाकम्भरी माणिक्य' अर्थात् साँभर का हीरा से विभूषित करता है। सिंहराज चाहमान राजवंश के प्रथम शासक थे जिन्होंने महाराजाधिराज की पदवी धारण की और लक्ष्मण एकमात्र राजा थे जिन्हें शाकम्भरी माणिक्य से विभूषित किया गया। लोग अक्सर यह कहते है कि,"मैं अकेला हूँ, क्या कर सकता हूं?" उन्हें इस इतिहास से सबक लेना चाहिए की जिस प्रकार अकेला व्यक्ति लक्ष्मण माँ शाकंभरी की कृपा से नाडोल जैसे विस्तृत साम्राज्य का स्वामी बना था वैसे ही आप भी निश्चल होकर माँ आशापुरा की आराधना कर अपने कर्म कीजिए और विश्वास कीजिए की माँ आपकी सभी इच्छाएं जरूर पूर्ण करेगी।
राजराजेश्वरी कुलदेवी नाडोल राय माँ आशापुराजी मंदिर, नाडोल में मुख्य मंदिर के ठीक सामने राव लाखण जी की एक देवली लगी हुई है तथा देवली पर 5 पंक्तियों का एक लेख उत्कीर्ण है। इस लेख का पठन मेरे द्वारा सेव आवर हेरिटेज फाउंडेशन टीम के संग्रामसिंहजी गिंगालिया से दिनांक:15-10-2022 को करवाया गया, जो लेख पठन इस प्रकार से है :-
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।। संवत १ ७ ४ १ वुरष म-
ह असज सद ७ वत्स संघज -
न्ह मर्ती लाषण् क वन-
इज क द् व(द्वळी) सद १ मि-
त चत थव(प)ना ह्व वतसी 
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लेख का हिंदी अनुवाद :-
।।सम्वत १७४१ वर्ष माह-
आसोज सुदी ७ वत्स सिंघजी 
ने मूर्ति लाषन की बनवाई 
की देवळी सुदी १ मिती
चेत थरपना(प्रतिष्ठा) हुई वतसीं
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इस देवली के लेख के पठन से हमें यह जानकारी मिलती है की यह देवली वि.सं. 1741 या 1684 ई में आषाढ़ माह सुदी 7 (सप्तमी) को वत्ससिंहजी के द्वारा राव लाखणजी की मूर्ति बनवाई गई थी। इस देवली की प्रतिष्ठा चैत्र नवरात्रा की 1 (प्रथमा) तिथि को करवाई गई थी। यहां यह शोध का विषय है की इस देवली को बनवाने वाले वत्ससिंहजी कौन थे?
चौहानो के नाडोल राजवंश की राजावली :
1.राव लाखण (960-982 ई.)
2.राव शोभित (982-990 ई.)
3.राव बलिराज (990-994 ई.)
4.राव विग्रहपाल (994 ई.)
5.राव महेन्द्रराज (994-1005 ई.)
6.राव अश्वपाल (1005-1015 ई.)
7.राव अहिल (1015-1024 ई.)
8.राव अणहिलराज (1024-1055 ई.)- भीमदेव प्रथम, भोज परमार व महमूद गजनवी को पराजित किया।
9.राव बालाप्रसाद (1055-1070 ई.)
10.राव जेन्द्रराज (1070-1080 ई.)
11.राव पृथ्वीपाल (1080-1090 ई.)
12.राव जोजलदेव (1090-1110 ई.)
13.राव आसराज (1110-1119 ई.)
14.राव रत्नपाल (1119-1132 ई.)
15.राव रायपाल (1132-1145 ई.)
16.राव सहजपाल (1145-1148 ई.)
17.राव आल्हण (1148-1163 ई.)-इन्ही के पुत्र कीर्तिपाल से जालोर की सोनगरा व विजयसिंहजी से चाहमान वंश की सांचोरा शाखा चली।
18.राव केल्हणदेव (1163-1193 ई.)-1178 ई में मो. गौरी को हराया।
19.राव जयंतसिंह (1193-1197 ई.)
20.राव सामंतसिंह (1197-1202 ई.)-इनके बाद नाडोल का राज्य जालौर के सोनगरा चौहानों के अधीन हो गया।
सेवग गहरो सांभरी, प्रण राखण प्रतिपाल।
कीरत चहुँदिस आपरी, पसरे प्रिय दयाल।।
©आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी
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