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सोमवार, 9 मार्च 2026

पाली अधिपति राव अखेराज सोनगरा

पाली अधिपति राव अखेराज सोनगरा- सुमेल गिरी युद्ध के योद्धा

क्षत्रियों के छत्तीस कुलों में चाहमान सदैव सर्वश्रेष्ठ रहें हैं। इस श्रेष्ठता की कीमत चक्रवर्ती चाहमानों ने अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ अपने शीश देकर चुकाई हैं। मातृभूमि, देश, सनातन धर्म और कुल की मर्यादा के लिए जहाँ चाहमान वीरों ने साका कर युद्धभूमि में अंतिम रक्त की बूंद तक मरण को श्रेष्ठ माना वही वीरांगनाओं ने जौहर की ज्वाला को आत्मसात किया। यही जौहर की ज्वाला समय आने पर माताओं के सम्मान की संरक्षिका बनी और शत्रु की संहारक भी। जालोर के प्रसिद्ध शासक कान्हड़देव सोनगरा के छोटे भाई मालदेव मुंछाला थे। मालदेव के वंशक्रम में पाली के शासक रणधीर के पुत्र अखेराज सोनगरा हुये। जो अपने समय के कुशल नितिज्ञ, पराक्रमी, दातार और प्रसिद्ध योद्धा थे। मारवाड़, मेवाड़ और बीकानेर राजघरानों से उनके वैवाहिक सम्बन्ध उस काल में उनके विशिष्ट स्थान व उनकी महत्ता की पुष्टि करते हैं। अखेराज सोनगरा ने मारवाड़ व मेवाड़ की सहायतार्थ कई सैनिक अभियानों में भाग लेकर अपनी वीरता का प्रदर्शन किया था। 

राणा उदयसिंह को मेवाड़ गद्दी पर आसीन करना : बनवीर (राणा सांगा के भाई पृथ्वीराज का बेटा) ने 1536 ई में विक्रमादित्य (राणा सांगा के बेटे) की हत्या कर दी और चित्तौड़ की सत्ता हथियाली थी। बनवीर, विक्रमादित्य के छोटे भाई उदयसिंह द्वितीय (सांगा का पुत्र) को मारकर अपनी सत्ता सुरक्षित करना चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि उदयसिंह ही असली उत्तराधिकारी है। उसने उदयसिंह को मारने की कोशिश की, लेकिन पन्नाधाय ने उदयसिंह को बचाने के लिए अपने पुत्र चंदन का बलिदान देकर उसके षड़यंत्र को विफल कर दिया और उदयसिंह को कुंभलगढ़ पहुँचाया था। मेवाड़ की सत्ता हथियाने के बाद बनवीर ने उदयसिंह के नकली होने के का प्रचार कर दिया था। अखेराज सोनगरा ही वह पहले राजपूत शासक थे, जिन्होंने मेवाड़ के उदयसिंह के सिर शासक का ताज रखने की राह निकाली। मेवाड़ के उमरावों द्वारा उदयसिंह के साथ एक थाली में खाना खाकर शंका का समाधान करने के बाद उनके अनुरोध पर अखेराज सोनगरा ने अपनी पुत्री जयवंता बाई सोनगरी का विवाह राणा उदयसिंह के साथ करने की घोषणा की और उन्हें घोड़े, हाथी और रुपए भी दहेज स्वरूप दिये। यह विवाह होते ही उदयसिंह को मेवाड़ के उमरावों व चौहानों के साथ मारवाड़ का समर्थन भी स्वत: हासिल हो गया क्योंकि अखेराज सोनगरा राव मालदेव के समय में पाली के स्वतंत्र शासक थे व उनके ससुर थे। अखेराज जी की एक पुत्री पुरां सोनगरी का विवाह राव मालदेव के साथ हुआ था। राणा उदयसिंह ने बनवीर से लड़ाई के लिए अखेराज जी से सहायता मांगी। अत: मारवाड़ के प्रसिद्ध वीर कुम्पा, राणा, भदा, कान्ह, जैतसी उदावत व खींवकरण जी जैतारण आदि मारवाड़ व पाली की सेना लेकर अखेराज सोनगरा के साथ बनवीर से लोहा लेने मेवाड़ पहुंचे। जहां मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए प्रयासरत वहां के उमरावों को साथ लेकर माहौली (मावली) के निकट 1540 ई में घमासान युद्ध हुआ जिसमें बनवीर हार कर भाग गया। अनन्तर मेवाड़, मारवाड़ व पाली की संयुक्त सेनाओ ने चितौड़ पर अधिकार कर राणा उदयसिंह को राजगद्दी पर बैठा दिया। इस तरह मेवाड़ की स्वतंत्रता के लिए अखेराज सोनगरा के साथ रिश्तेदारी मेवाड़ के लिए महत्त्वपूर्ण साबित हुई क्योंकि अखेराज सोनगरा उदयसिंह के साथ अपनी बेटी का विवाह नहीं करते तो शायद उनकी ताजपोशी भी मुश्किल थी, क्योंकि किसी को भरोसा नहीं हो रहा था कि पन्नाधाय ने जिस बालक को बचाया है, वह उदयसिंह ही है। इस तरह अखेराज सोनगरा की मदद से चित्तौड़ में सिसोदियो का सूर्य फिर उदय हुआ। जयवंता बाई की कोख से ज्येष्ठ सुदी तीज, 09 मई 1540 को रात्री 9 बजे आद्रा नक्षत्र में राणा प्रताप का जन्म पाली किले में हुआ। कुंवर प्रताप के जन्म पर उनके नानोसा अखेराजजी ने बहुत खुशियां मनाई।  

सुमेल गिरी युद्ध : राठौड़ वंश में जोधपुर के शासक मालदेव, मेड़ता के वीरमदेव व बीकानेर के कल्याणमल के बीच आपसी कलह के चलते मेड़ता के वीरमदेव के बुलावे पर 1544 ई में दिल्ली के बादशाह शेरशाह सूरी को राव मालदेव पर आक्रमण का मौका मिल गया। इतिहास बताता है कि राव अखेराज सोनगरा का मेवाड़, मारवाड़ सहित कई रियासतों में दबदबा था। इनकी वीरता के कारण ही शेरशाह सूरी की चढ़ाई की खबर कुम्पाजी ने अखेराज सोनगरा के पास पाली भेजी। इतिहासकार डॉ. हुकमसिंह भाटी के अनुसार अखेराज उस वक्त अपने साथियों संग लाखोटिया सरोवर में स्नान कर रहे थे। सन्देश वाहक रैबारी ने सूचना दी तो अखेराज प्रसन्न हुए क्योंकि उनका मानना था कि क्षत्रिय के लिए युद्ध लड़ना या युद्धभूमि में लड़ते हुए प्राणोत्सर्ग करना श्रेष्ठ बात है। सूचना के बाद अखेराज अपने पुत्र भोजराज के साथ अपना सैन्यदल लेकर शेरशाह से मुकाबले के लिए अजमेर में राव कूंपा के पास जा पहुंचे। राव मालदेव भी सेना के साथ अजमेर पहुंच गए। मालदेव के कहने पर मारवाड़ की सेना ने अजमेर से हटकर गिरी के पास पड़ाव डाला। इस बीच किसी धोखे व षड्यंत्र की आशंका के चलते मालदेव युद्ध क्षेत्र से अनेक सरदारों व अधिकांश सेना के साथ रात को ही जोधाणा होते हुए सिवाना का रुख कर लिया। इस खबर से मारवाड़ की तरफ से लड़ रहे पीछे रहे योद्धाओं को बहुत दुख हुआ। तब राव अखेराज सोनगरा पाली, राव खींवकरणजी जैतारण, राव कुम्पाजी माण्डा, राव जैताजी बगड़ी, राव पंचायणजी खींवसर, जैतसी उदावत आदि निर्भीक योद्धाओं ने बिना मारवाड़ के राजा के शेरशाह से दो-दो हाथ करने का निर्णय लिया और अपने से कई गुना बड़ी सेना के साथ भीड़ गए। सुबह होते ही सुमेल के युद्धक्षेत्र में इस लड़ाई में जांबाज राव अखेराज सोनगरा पाली सहित लगभग 6 हजार (कुछ किताबों में 12 या 22 हजार) सैनिकों ने शेरशाह की 40 तोपों सहित 80 हजार सैनिकों की भारी भरकम सेना पर शेर की तरह दहाड़ते हुए हुंकार कर टूट पड़े व डटकर मुकाबला किया। इससे शेरशाह के सैनिकों में अफरा-तफरी मच गई। छोटी सेना के बड़े पराक्रम को भांप कर शेरशाह के सैनिकों ने उनको गिरी-सुमेल रणक्षेत्र छोड़ने की सलाह दे दी। इस रण में मारवाड़ व पाली के पराक्रमी जांबाज बलिदान हो गए, लेकिन इनके युद्ध कौशल का साक्षी रहा गिरी-सुमेल रणक्षेत्र इतिहास का अध्याय बन गया। इस युद्ध में अखेराज ने अपनी तलवार का जौहर दिखाते हुए अपने पुत्र भोजराज व 21 अन्य सोनगरा चौहानों के साथ वीरगति प्राप्त की। यह युद्ध चैत्र बदी पंचमी वि.सं. 1600 या 1544 ई को हुआ था। इस युद्ध में मारवाड़ के वीरों के छोटे से सैन्य दस्ते ने शेरशाह की विशाल सेना का भयानक नुकसान किया। इसके बाद बौखलाए शेरशाह सूरी द्वारा कहा गया एक वक्तव्य इतिहास में प्रचलित है :
बोल्यो सूरी बैण यूँ, गिरी घाट घमसाण।
मूठी खातर बाजरी, खो देतो हिंदवाण।।
अर्थात् मैं “एक मुट्ठी बाजरे के लिए वह हिंदुस्तान की सल्तनत खो देता।"
वीरता के साथ-साथ अखेराज जी शकुन विद्या के भी अच्छे जानकार थे। उन्होंने अपने सैनिक अभियानों व प्रशासनिक कार्यों के अनुभव पर “सुगनावली” नामक ग्रन्थ की रचना की थी। जिसमें शकुन देखने की विधि, दिशाओं का ज्ञान, रोजगार के जाने, राजा से मिलने, युद्ध अभियान के लिए प्रस्थान करने, कामदार आदि कर्मचारियों की नियुक्ति करने या हटाने, राजा का राजधानी से प्रस्थान करने, बारात प्रस्थान, अकाल-सुकाल, वस्तुओं के मूल्य घटने-बढ़ने, जलाशय तथा कुआ खुदवाने इत्यादि अनेक विषयों पर अच्छे-बुरे शकुनों की जानकारी सरल भाषा में लिपिबद्ध की।

राव अखेराज के वंशज : अखेराजजी के मानसिंह, भाणसिंह, उदयसिंह, भोजराज, जयमल व रतनसिंह पुत्र थे। मानसिंह पाटवी हुए जो 1576 ई के हल्दीघाटी के युद्ध में प्रताप के पक्ष में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इनके पुत्र जसवंतसिंह राणा प्रताप के छापामार युद्धों में शामिल रहे। मारवाड़ के मोटाराजा उदयसिंह ने उनको विसं 1644 में बुलाया व पाली पट्टे की जागीर 27 गांवों के साथ दी, फिर 30 गांव दिए। विसं 1665 के आसपास पाली छूट गया तब वे उदयपुर राणा के पास गए, जसवंतसिंह के 11 पुत्र थे। इनमे सबसे बड़े पुत्र वीरमदेव थे। जसवंतसिंह के पुत्र राजसिंह को भी विसं 1672 में पाली का ठिकाना रहा बाद में छूट गया। इनके एक पुत्र जगन्नाथ को विसं 1677 में पाली का पट्टा मिला पर 1691 में अमरसिंह राठौड़ के साथ जाने से पाली फिर छूट गयी। इनके पुत्र श्यामसिंह को 1679 में जोधपुर रियासत के गुड़ा-भाद्रजूण जागीर में मिला। श्यामसिंह के पुत्र उदयभान, महाराजा जसवंतसिंह के साथ कई लड़ाइयों में लड़े। इनके अन्य भाईयों को मालवा में कई जमींदारिया मिली। उदयभान के पुत्र भोपतसिंह को रतलाम रियासत की में 5 गाँवो सहित नामली का ठिकाना विसं 1788 में मिला। इनके वंशजों की रतलाम राज्य में बाजड़ा, सकरवाद, सिरखेड़ी, भदवासा; जावरा राज्य में बदगढ़; सैलाना राज्य में गुणावद; ग्वालियर राज्य में बानीखेड़ी आदी की जमींदारिया थी। रतलाम पर बापूराय सिंधिया द्वारा आक्रमण करने पर तेजसिंह रणखेत रहे। तेजसिंह के वंशजों के लावा मालवा में अन्य अखेराज सोनगरों की अरजला, अरसंदला, उमरने, नलकोई, पीपलखूंटा, झरखेड़ी, काडरवास आदि गाँवो की जमींदारिया थी जहाँ इनके वंशज आज भी निवास करते है। श्री अखेराज सोनगरा स्मारक विकास समिति द्वारा अखेराज जी के वंशजों के ठिकानों गिरवर, कूरना, बाला, डेंडा, कांतरा, दयालपुरा, गुड़ा सोनीगरा, चावंडिया, केनपुरा, बोया, सादड़ा, ऐलानी, धणी, पीपाड़ा, निंबाज, हिदास, नामली आदि के सहयोग से निर्मित स्मारक रणभूमि को समर्पित किया गया।
प्रमुख छ:हों सामंतों का प्राचीन छप्पय -
खागडेल भिड़ खींम, खलां दल त्रिजड़ो खंडै। 
सबल जैतसी सूर, थटां पतसाही थंडै।। 
जेता कूंपा जोध, गयन्द तुखारों गंजै। 
अखेराज चहुॅंआण, भिड़ों दल दिल्ली भंजै।। 
पंचायण सूरो प्रबल, किलमांणां कलहल करै। 
माल जसो मुड़ियां पछे, सांवत छै साथे मरै।।
सुमेल गिरी युद्ध के महानायक पाली के शासक राव अखेराजजी सोनगरा चौहान, कुंपाजी, जैताजी, खींवकरणजी सहित हजारो क्षत्रिय वीरों के बलिदान दिवस पर कोटि कोटि नमन। ऐसे वीर अमर रणबांकुरो के त्याग और बलिदान के कारण ही हमारा धर्म संस्कृति बची है। 

ओझल हो रही स्मृति, सिमट रहा इतिहास।
बॉट निहारे पूर्वज, करके हमसे आस।।
 आलेख- दयालसिंह चौहान-सिलारी